इंडियन सिनेमा के आइकॉनिक और खतरनाक विलेन्स की बात होती है तो जेहन में सबसे पहले अमरीश पुरी का नाम आता है। 22 जून 1932 को नवांशहर जालंधर, पंजाब में जन्मे अमरीश पुरी की आज 92वीं बर्थ एनिवर्सरी है। एक्टर के बर्थ एनिवर्सरी पर उनके ग्रैंडसन वर्धन पुरी मुंबई के दैनिक भास्कर के ऑफिस में आए और अपने दादू को यादकर करके भावुक हो गए। अमरीश पुरी को वर्धन पुरी प्यार से दादू कहते हैं। बातचीत के दौरान वर्धन ने बताया कि दादू के नाटकों की इंडस्ट्री की कई बड़ी हस्तियां फैन थी। एक बार राज कपूर साहब प्ले देखने आए तो ऑडिटोरियम लोगों से भरा हुआ था। जमीन पर बैठकर उन्होंने प्ले देखा। प्ले खत्म होने के बाद स्टेज पर जाकर दादू को गले लगाकर बोले थे कि अमरीश एक दिन इंडस्ट्री की शान बनोगे। वर्धन अपने दादू को अपना बेस्ट मानते थे। वह कहते हैं- दादू मेरे बेस्टफ्रेंड थे और हमेशा रहेंगे। जब भी उनका जिक्र होता है तो चेहरे पर मुस्कान और आंखों में नमी होती है। घर पर मिडल क्लास फैमिली जैसा माहौल रहता था। दादू की जो छवि रही है, उससे स्कूल के बच्चे घर आने से डरते थे। दादू को टॉम एण्ड जेरी बहुत पसंद था। आज अमरीश पुरी की बर्थ एनिवर्सरी पर उनके ग्रैंडसन वर्धन पुरी से जानते हैं कुछ दिलचस्प किस्से, उन्हीं की जुबानी ….. हमें पता ही नहीं चला कि दादू बड़े स्टार हैं हमें दादू की शूटिंग पर जाने की अनुमति नहीं थी। दादा और दादी का मानना था कि अगर हम सेट पर जाएंगे तो हमारा दिमाग खराब हो जाएगा। ऐसा लगने लगेगा कि हम दूसरों बच्चों से अलग या फिर स्पेशल हैं। घर का माहौल भी बहुत ही साधारण था। मुझे और मेरी बहन को मिडिल क्लास फैमिली की परवरिश दी गई। हमें कभी पता ही नहीं चला कि दादू बड़े स्टार हैं। हमें लगता था कि हमारे दादा दूसरे के दादाओ की तरह हैं, जो सुबह ऑफिस जाते हैं और रात को घर आ जाते हैं। होटल के मैनेजर ने बिल नहीं लिया जब हम बाहर डिनर पर या किसी के घर जाते थे। लोगों का जमावड़ा देखकर, उनका नाम लेकर चिल्लाते देखकर, एहसास हो गया था कि दादू कोई बड़ी हस्ती हैं। एक बार ताज होटल में डिनर के लिए गए थे। मैनेजर और होटल के बाकी स्टाफ आकार हमारे आस पास खड़े हो गए। मैं सोच रहा है कि बाकी टेबल पर इस तरह की खातिरदारी नहीं हो रही है। मैनेजर ने दादू से बिल नहीं लिया। हमें केक पैक करके दिए। मैं रास्ते भर सोचता रहा कि दादू जरूर कोई बड़ी हस्ती हैं। स्कूल के बच्चों के पेरेंट्स उन्हें मेरे घर आने से मना करते थे फिल्मों में दादू की विलेन की जो छवि रही है। उसे देखते हुए स्कूल के बच्चों के पेरेंट्स कहते थे कि वर्धन से दोस्ती करना,लेकिन उनके घर मत जाना। पता नहीं घर में कैसा माहौल होगा? दादू की फिल्मों वाली इमेज के बारे में ही लोग सोचते थे कि घर में बहुत बड़ा स्वीमिंग होगा। चेयर पर बैठकर सिगार और वाइन की चुस्की ले रहे होंगे। कभी शराब और सिगरेट नहीं पी दादू ने कभी भी शराब और सिगरेट को हाथ नहीं लगाया। बहुत ही अनुशासन में रहते थे।लेकिन फिल्मों को देखकर लोगों ने उनके बारे में एक अलग ही धारणा पाल रखी थी। इस वजह से स्कूल के बच्चे बहुत डरते थे। मेरे घर आने से पहले पूछते थे कि अमरीश जी तो घर पर नहीं होंगे? वो कहते थे कि दादू घर पर नहीं होंगे तब आएंगे। एक बार यह बात दादू को पता चल गई। दादू घर पर ही थे। हम खेल रहे थे। दादू अंदर आए और उन्हें देखकर सब बच्चे जोर-जोर से चिल्लाकर रोने लगे। लेकिन दादू बच्चों से ऐसे घुलमिल गए कि बच्चों को उनके साथ खेलने में बहुत मजा आया। बच्चें खुद अपने पेरेंट्स से बोलने लगे कि मुझे अमरीश पुरी अंकल के घर जाना है। सेट पर जाने के लिए पाबंदी लगा दी थी एक बार फिल्म ‘चोरी चोरी चुपके चुपके’ के सेट पर बहन और बुआ के बच्चों के साथ गया था। असिस्टेंट्स डायरेक्टर और प्रोडक्शन वाले बहुत खुश हुए कि अमरीश पुरी जी की फैमिली आई है। किसी ने आकार पूछा कि क्या खाएंगे? मैंने बोल दिया कि सैंडविज खाऊंगा और बहन ने बोला कि कॉफी पीऊंगी। ताज होटल से सैंडविज और कॉफी आ रहा है और हमें चांदी के प्लेट में खिलाया जा रहा है। उन्हें लग रहा था कि यह सब देखकर दादू खुश हो जाएंगे। लेकिन जब दादू को पता चला तो बहुत नाराज हुए। वो बोले कि बच्चों के साथ ऐसा क्यों ट्रीट कर रहे हो? इनका तो दिमाग खराब हो जाएगा। अगर कुछ मांगा है तो चॉकलेट दे दो,उसी में खुश हो जाएंगे। उसके बाद दादू ने सेट पर जाने के लिए हमेशा के लिए पाबंदी लगा दी थी। चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर काम नहीं करने दिया मुझे चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर एक दादू के साथ सुभाष घई साहब की फिल्म ‘परदेस’ में काम करने का मौका मिला था। मैं बहुत ही एक्साइटेड था कि दादू के साथ काम करने का मौका मिल रहा है। मैं अपनी इस खुशी को सेलिब्रेट कर रहा था। लेकिन दादू ने मना कर दिया। वे बोले कि इससे पढ़ाई पर असर पड़ेगा। मैं बहुत उदास हो गया। दादू से नाराज भी हुआ। ऐसा नहीं था कि दादू मेरे एक्टिंग करियर के खिलाफ थे। उनका यह मानना था कि कोई भी काम समय से होना चाहिए। पहले उस काबिल हो जाओं की अपने बारे में खुद कोई निर्णय ले सको। उस रोल को बाद में आदित्य नारायण ने किया। दादी ने समझाया कि दादू तुम्हारे भले के लिए ऐसा कर रहे हैं। उनकी बात तुम्हें तब समझ आएगी, जब बड़ा होंगे। जब मैं 15-16 साल का हुआ तभी समझ गया था कि दादू ने सही कहा था। फिल्मी पॉलिटिक्स और गॉसिप का कल्चर घर पर नहीं था हमारे घर पर फिल्मों की बात होती थी, लेकिन फिल्मी बात नहीं होती थी। गॉसिप और फिल्मी पॉलिटिक्स के बारे में बात नहीं होती थी। घर पर कहानियों और टेक्निक को लेकर बात होती थी। दिग्गजों के फिल्म प्रोसेस को लेकर बात होती थी। राजकपूर,यश चोपड़ा और सुभाष घई के फिल्म मेकिंग के प्रोसेस पर बात होती थी। घर का वातावरण बहुत ही पॉजिटिव है। दादू के पिताजी यानि के मेरे परदादा निहाल चंद पुरी ने डिसाइड किया था कि गॉसिप का कल्चर हमारी फैमिली में नहीं चलेगा। जिसकों भी इन सब बातों में इंट्रेस्ट हो,वो घर से बाहर जाकर बात करेगा। यश चोपड़ा ने कहा था कि ‘फूल और कांटे’ सुपर हिट कर दी यश चोपड़ा साहब की ‘लम्हे’ और अजय देवगन की डेब्यू फिल्म ‘फूल और कांटे’ एक साथ ही रिलीज हुई थी। ‘लम्हे’ में सभी बड़े दिग्गज लोग थे। ‘फूल और कांटे’ में दादू के अलावा सभी नए थे। उस समय फूल और कांटे के बारे में कोई बात नहीं कर रहा था। सबको यकीन था कि ‘लम्हे’ सुपरहिट होगी। यह बहुत कमाल की फिल्म थी, लेकिन नहीं चली। ‘फूल और कांटे’ सुपरहिट हो गई। यश चोपड़ा जी ने दादू को फोन करके बोला था, ‘अमरीश पुरी साहब आपने तो कमाल कर दिया, हमारी इतनी बड़ी फिल्म थी, वह नहीं चल रही है। आपने ‘फूल और कांटे’ सुपर हिट कर दी। सब कह रहे हैं कि आप फिल्म के सेलिंग पॉइंट हैं। दिस इज कॉल्ड अमरीश पूरी मैजिक।’ राज कपूर ने जमीन पर बैठकर देखा था प्ले इंडस्ट्री की कई बड़ी हस्तियां दादू के नाटकों के बहुत बड़े फैन थे। दादू ने मुझे बताया था कि एक दिन बहुत जबरदस्त बारिश हो रही थी। सड़कों पर पानी भरा हुआ था। राजकपूर साहब प्ले देखने आए। ऑडिटोरियम लोगों से भरा हुआ था। जमीन पर बैठकर राज कपूर साहब ने प्ले देखा। प्ले खत्म होने के बाद स्टेज पर जाकर दादू को गले लगा लिया। कान में किस करते हुए बोले थे- अमरीश एक दिन इंडस्ट्री की शान बनोगे, वो वक्त आने वाला है। कपूर परिवार के साथ बहुत खास रिश्ता है कपूर परिवार के साथ हमारा बहुत खास रिश्ता है। माटुंगा में हमारे परिवार का पहला घर अभी भी है। उसके बगल में कपूर परिवार का घर है। राज कपूर, शम्मी कपूर,शशि कपूर, रणधीर कपूर, ऋषि कपूर, राजीव कपूर वहीं पले बढ़े हैं। जब मेरी दादी प्रेग्नेंट थीं, उसी समय शशि कपूर जी की वाइफ भी प्रेग्नेंट थीं। साथ में ही वॉक करते थे। तब से हमारे परिवार का कपूर परिवार के साथ रिश्ता है। राज कपूर साहब ने ऋषि कपूर अंकल से दादू के बारे में कहा था कि एक दिन यह बम फटने वाला है। जब फटेगा पूरी दुनिया को इसकी गूंज सुनाई देगी। सुभाष घई को अमरीश पूरी के बारे में मदन पूरी ने बताया था दादू का सुभाष घई साहब के साथ बहुत ही प्यारा रिश्ता था। अपनी पहली फिल्म में उन्होंने दादू की सिर्फ आवाज यूज की थी। घई साहब, मदन दादू (मदन पुरी) के साथ काम करते थे। मदन दादू ने सुभाष घई साहब को दादू के बारे में बताया था कि मेरा एक छोटा भाई है। जो मुझसे भी कमाल का एक्टर है। अगर आपकी मुलाकात उनसे हो गई तो जितने भी विलेन हैं, उन सबको भूल जाएंगे, उनसे एक बार मिलो। सुभाष घई ने पहली ही नजर में दादू को अपने माइंड में बैठा लिया था दादू ईएसआईसी में जॉब के अलावा थिएटर भी करते थे। एक दिन मदन दादू के सेट पर गए और पैर छू कर प्रणाम किए। घई साहब की उन पर नजर पड़ी। उन्होंने कहा कि ऐसा रोमन फेस कभी नहीं देखा है। तभी से उन्होंने दादू को अपने माइंड में बैठा लिया था। जब भी कोई स्क्रिप्ट लिखते हैं, तो दादू की इमेज को ध्यान में रखकर लिखते थे। ‘हीरो’ में दादू का इंट्रोडक्शन सीन जिस तरह से घई साहब ने शूट किया है। किसी और फिल्म में वैसा इंट्रोडक्शन सीन किसी किरदार का नहीं देखा। टॉम एंड जेरी फेवरेट प्रोग्राम था दादू के साथ टॉम एंड जेरी बैठकर देखता था। दादू मुझसे कहा करते थे कि उन्होंने टॉम एंड जेरी देखकर एक्टिंग सीखी है। टॉम एंड जेरी की जो अदाकारी थी, उनके बीच की जो कमेस्ट्री थी, वह दादू को बहुत कमाल की लगती थी। वो हमेशा कहते थे कि अगर एक्टिंग सीखनी हैं, तो टॉम एंड जेरी देखो। इससे ज्यादा इंटरटेनिंग कोई भी शो नहीं है। इस शो का मनोरंजन का जो लेवल है, उसे कोई बीट ही नहीं कर सकता है। इसके अलावा चार्लीन चैपलिन की फिल्में बहुत देखते थे। किशोर कुमार को बहुत मानते थे। वो कहते थे कि उनके जैसा फनकार कोई पैदा ही नहीं हुआ है और न होगा। किशोर दा की सारी फिल्में देखते थे। मुगल- ए- आजम 300 बार देखी किशोर कुमार की सारी फिल्मों के अलावा दादू, राज कपूर की फिल्में देखते थे। हमने अपने होम थिएटर में ‘मुगल- ए- आजम’ दादू के साथ 300 बार देखी होगी। दो बीघा जमीन, प्यासा, आवारा,बॉबी, मिस्टर इंडिया दादू की फेवरेट फिल्में रही हैं। हर फिल्म को बार-बार देखते थे। दादू कहते थे- पहली बार स्टोरी के लिए फिल्म देखता हूं। फिर परफार्मेंस,टेक्निक,बैकग्राउन्ड म्यूजिक,सिनेमेटोग्राफी के लिए अलग- अलग देखता हूं। इस तरह से दादू हर फिल्म को 20-25 बार देखते थे। थिएटर करने का बहुत मन करता था दादू का थिएटर करने का बहुत मन करता था। लेकिन फिल्मों में ज्यादा बिजी रहने की वजह से थिएटर नहीं कर पा रहे थे। लेकिन गुजरने के तीन साल पहले उन्होंने एक प्ले ‘कनुप्रिया’ पूना में किया था, जिसे सत्यदेव दुबे ने डायरेक्ट किया था। मैं तो नहीं जा पाया था। लेकिन अमोल पालेकर साहब ने बहुत ही कमाल का किस्सा बताया था। जब दादू परफार्म कर रहे थे, तो उनके रोंगटे खड़े हो गए थे। क्योंकि कई सालों के बाद वो परफार्म कर रहे थे। जैसे ही परफार्मेंस खत्म हुआ और कर्टन बंद हुआ। जमीन पर गिरकर रोने लगे। सब परेशान हो गए कि क्या हो गया। 10 मिनट तक रोते ही रहे। जब उठे तो एक ही चीज बोले कि हर एक कलाकार इसी लम्हे के लिए जिंदा रहता है। जब डायरेक्ट आडियन्स से कनेक्ट होता है। जो सिनेमा में नहीं मिलता है। निधन पर दो दिन बंद रही इंडस्ट्री 12 जनवरी 2004 में अमरीश पुरी का निधन हो गया। वर्धन ने कहा-फिल्म इंडस्ट्री में कभी छुट्टी नहीं होती है। जब दादू का देहांत हुआ था तो दो दिन तक कोई शूटिंग नहीं हुई थी। सब घर पर मातम मना रहे थे, रो रहे थे, सब उदास थे। सब यही कह रहे थे कि इंडस्ट्री में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी ने काम नहीं किया। फिल्म इंडस्ट्री ने दादू को जो यह सम्मान दिया है, इससे बड़ा कोई सम्मान नहीं हो सकता है।