साल 1858…अमेरिका के इलिनोइस राज्य में सीनेट (राज्यसभा) के चुनाव हो रहे थे। रिपब्लिकन पार्टी के अब्राहम लिंकन और नॉर्दन डेमोक्रेट्स के स्टीफन डगलस के बीच मुकाबला था। डगलस जहां भाषण देते ​ लिंकन भी वहां पहुंच जाते। वे डगलस के भाषणों में कही बातों की खामियां निकालते। लिंकन के यूं पीछा करने से तंग आकर डगलस ने उन्हें बहस की चुनौती दी। मौके के इंतजार में बैठे लिंकन तुंरत तैयार हो गए। इसी की तर्ज पर 102 साल बाद 1960 में पहली प्रेसिडेंशियल डिबेट हुई। कल अमेरिका के 64 साल पुराने प्रेसिडेंशियल डिबेट के इतिहास को आगे बढ़ाते हुए डोनाल्ड ट्रम्प और जो बाइडेन आमने-सामने होंगे। इस स्टोरी में अमेरिकी प्रेसिडेंशियल डिबेट्स के बारे में वो सब कुछ जानिए जो जरूरी है, जैसे… ये कब शुरू हुई, कैसे कराई जाती हैं और उनका चुनाव पर कितना असर होता है.. लिंकन-डगलस की बहस जिसने प्रेसिडेंशियल डिबेट का आधार तय किया… प्रेसिडेंशियल डिबेट क्या होती है?
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव से पहले उम्मीदवारों के बीच अहम मुद्दों पर बहस कराई जाती है। इसके आधार पर वोटर्स उम्मीदवारों को लेकर राय बनाते हैं। इसे प्रेसिडेंशियल डिबेट कहा जाता है। कभी कॉलेज तो कभी म्यूजिक हॉल्स में हुई प्रेसिडेंशियल डिबेट
1960 में हुई अमेरिका की पहली प्रेसिडेंशियल डिबेट को टीवी स्टुडियो में कराया गया था। ये बहस कराने के लिए कोई गवनर्मेंट बॉडी नहीं थी। 4 फेज में हुई डिबेट्स को CBS, NBC और ABC ने प्रसारित किया था। इसके बाद लगातार 3 बार डिबेट नहीं हुई। 1976 में डिबेट्स का आयोजन फिर शुरू हुआ। हालांकि, ये टीवी स्टूडियो में न होकर कॉलेज, थिएटर और म्यूजिक हॉल जैसी सार्वजनिक जगहों पर होती थी। इसकी कवरेज के लिए पूरे अमेरिका से पत्रकार पहुंचते थे। 1976 से 1984 तक इन डिबेट्स को लीग ऑफ वुमेन वोटर्स (LWV) नाम की एक संस्था ने स्पॉन्सर किया था। 1987 में LWV ने स्पॉन्सरशिप वापस ली तो बहस के लिए ‘कमिशन ऑन प्रेसिडेंशियल डिबेट’ बनाया गया। कमिशन ने 1988 से 2020 तक 9 बहस करवाई, हालांकि, 2020 में इसके तरीकों पर रिपब्लिकन पार्टी ने ऐतराज जताया था। इसके चलते कमिशन ने इस बार बहस से दूरी बना ली। 2024 में 64 साल बाद प्रेसिडेंशियल डिबेट्स की टीवी स्टूडियो में वापसी होगी। इसका आयोजन CNN और ABC करेंगे। टॉस से तय होता है किस तरफ खड़े होंगे उम्मीदवार (अब बहस के नियम जानिए) 1960 से 1988 तक कैंडिडेट्स पत्रकारों के पैनल के सवालों के जवाब देते थे। तब मॉडरेटर का काम सिर्फ नियमों को समझाना होता था। हालांकि, इसमें एक परेशानी थी। पत्रकारों का पैनल उम्मीदवारों का बहुत ज्यादा समय लेते थे और बहस के दौरान उनका ध्यान भी भटकाते थे। इसके बाद 1992 से पैनल सिस्टम हटा दिया गया। 1992 में वोटर्स ही कैंडिडेट्स से सवाल करने लगे। लेकिन अगली बार से इसे भी हटा दिया गया और 1996 से मॉडरेटर ही सवाल पूछने की जिम्मेदारी निभाने लगे। बहस में उम्मीदवार किस तरफ खड़ा होगा इसके लिए भी टॉस होता है। टॉस जीतने के बाद उम्मीदवार के 2 में से एक ऑप्शन चुन सकता है। 1. किस तरफ खड़ा होना है। या 2. बहस के बाद क्लोजिंग स्टेटमेंट देना है। इस बार का टॉस बाइडेन ने जीता है। उन्होंने खड़ा होने के लिए सबसे ज्यादा मुफीद जगह (स्टेज का बायां हिस्सा) चुना। इससे टीवी पर डिबेट देखने वाले लोगों को बाइडेन दाईं तरफ दिखेंगे। रिसर्च के मुताबिक इंसान जब कुछ देखता है तो उसका ज्यादा ध्यान दाईं तरफ होता है। बाइडेन के दाईं ओर दिखने की वजह से उन्हें जनता से ज्यादा अटेंशन मिलेगी। वहीं, डोनाल्ड ट्रम्प को क्लोजिंग स्टेटमेंट देने का मौका मिलेगा। अब अमेरिका की प्रेसिडेंशियल डिबेट से जुड़े रोचक किस्से पढ़िए…. किस्सा-1 उम्मीदवार- जिमी कार्टर VS जेराल्ड फोर्ड (1976) जनता कमजोर न समझे इसलिए डिबेट में 27 मिनट खड़े रहे उम्मीदवार कार्टर और फोर्ड की बहस रूस-अमेरिका के बीच चल रहे शीत युद्ध के दौरान हुई थी। डिबेट में जेराल्ड फोर्ड ने कह दिया कि रूस का पश्चिमी यूरोप पर किसी तरह का दबदबा नहीं है। जबकि अमेरिका में बच्चा-बच्चा तक ये जानता था कि पश्चिम यूरोप के ज्यादातर देशों पर सोवियत रूस का असर था। फोर्ड की ये बात सुनकर डिबेट का संचालन कर रहे न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार मैक्स फ्रैंकल खुद को रोक नहीं पाए, कार्टर के बजाय उन्होंने ही फोर्ड के दावे का खंडन कर दिया। इस विवाद की वजह से फोर्ड की छवि ऐसे नेता के तौर पर बन गई जिन्हें कुछ जानकारी ही नहीं है। फोर्ड 1976 के चुनाव में हार गए। इसी बहस के दौरान माइक भी खराब हो गया था, जिसके चलते उम्मीदवारों को 27 मिनट तक इंतजार करना पड़ा। इस दौरान न तो कार्टर और न ही फोर्ड ने बैठने को कहा, उन्हें डर था कि ऐसा करने से जनता उन्हें कमजोर समझेगी। किस्सा- 2 उम्मीदवार- रोनाल्ड रीगन VS वॉल्टर मोंडेल (1984) जब रीगन ने साबित किया- उम्रदराज होना हमेशा घाटे का सौदा नहीं… 1984 में राष्ट्रपति पद की डिबेट्स के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति और 73 साल के रिपब्लिकन कैंडिडेट रोनाल्ड रीगन डेमोक्रेट्स कैंडिडेट 56 साल के वॉल्टर मोंडेल से पिछड़ रहे थे। मीडिया में उनकी अधिक उम्र को लेकर सवाल पूछे जा रहे थे, लेकिन रीगन के एक जवाब ने पूरा माहौल बदल दिया। पैनलिस्ट ने रीगन से पूछा कि क्या इतनी अधिक उम्र होने के बाद वे राष्ट्रपति जैसे अहम पद की जिम्मेदारी ठीक से निभा पाएंगे? इस पर रीगन ने बड़ा चालाकी भरा जवाब दिया। उन्होंने कहा- मैं इस डिबेट्स में जीत हासिल करने के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी की कम उम्र और अनुभवहीनता का फायदा नहीं उठा सकता। रीगन ने आगे कहा- किसी ने कहा था कि अगर बुजुर्गों ने युवाओं की गलतियों को नहीं सुधारा होता तो दुनिया में कोई देश नहीं होता। रीगन ने उम्र को अपनी ताकत के तौर पर पेश किया और वे चुनाव जीत गए। किस्सा- 3 उम्मीदवार- माइकल डुकाकिस VS जॉर्ज HW बुश (1988) जब कैंडिडेट से पूछा गया- पत्नी के रेपिस्ट के साथ कैसा सलूक करेंगे? 1988 में राष्ट्रपति पद की बहस में एक एंकर ने डेमोक्रेट कैंडिडेट माइकल डुकाकिस से मौत की सजा को लेकर उनके विरोध के मुद्दे पर सवाल पूछ लिया जिसमें उनकी पत्नी का भी जिक्र था। एंकर ने पूछा कि अगर आपकी पत्नी का कोई रेप करने के बाद हत्या कर देता है तो आप क्या उसकी मौत की सजा का समर्थन नहीं करेंगे? इस पर डुकासिस ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि मौत की सजा कोई सॉल्यूशन है। उनके इस जवाब को जनता ने पसंद नहीं किया। बाद में डुकासिस ने अफसोस जताते हुए कहा- काश मैंने कहा होता कि मेरी वाइफ इस दुनिया में मेरे लिए सबसे कीमती चीज है। किस्सा- 4 उम्मीदवार- जॉर्ज बुश सीनियर-बिल क्लिंटन-रॉस पेरौट (1992) डिबेट में बोर हो गए थे बुश, घड़ी देखने लगे अक्टूबर 1992 में राष्ट्रपति बुश, डेमोक्रेटिक कैंडिडेट बिल क्लिंटन और स्वतंत्र उम्मीदवार रॉस पेरौट के बीच बहस हो रही थी। इस दौरान ऑडिएंस में खड़े एक मेंबर ने बुश से आर्थिक मंदी से जुड़ा एक सवाल पूछ लिया। जब ये सवाल पूछा जा रहा था तो बुश अपनी घड़ी देख रहे थे। वो सवाल ठीक से सुन भी नहीं पाए। उनके इस जेस्चर को लेकर अखबारों ने लिखा कि बुश डिबेट में बुरी तरह बोर हो गए और वे ज्यादा देर तक इसका हिस्सा नहीं बने रहना चाहते थे। इससे लोगों के बीच गलत संदेश गया। वे चुनाव हार गए। अब जानिए ट्रम्प से ज्यादा बाइडेन के लिए क्यों अहम है प्रेसिडेंशियल डिबेट 27 जून की डिबेट में पहली बार ऐसा होगा जब कोई वर्तमान राष्ट्रपति (बाइडेन) किसी पूर्व राष्ट्रपति (ट्रम्प) से बहस करेगा। बाइडेन डेमोक्रेटिक और ट्रम्प रिपब्लिकन पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, मगर अब तक दोनों ही पार्टियों ने इन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। ऐसी चर्चा है कि ट्रम्प को जुलाई में और बाइडेन को अगस्त में पार्टी से सिंबल मिल जाएगा, मगर फिर भी ये डिबेट बाइडेन के लिए अहम होने वाली है। दरअसल बाइडेन अपनी उम्र को लेकर लगातार आलोचकों के निशाने पर रहते हैं। यहां तक कि उनसे सिर्फ 3 साल छोटे डोनाल्ड ट्रम्प भी उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए अयोग्य घोषित कर चुके हैं। जानकारों का कहना है कि सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो वायरल हुए हैं जिसमें बाइडेन के हाव-भाव संकेत देते हैं कि उनकी उम्र को लेकर हो रही आलोचनाएं बेवजह नहीं हैं। ऐसे में ये डिबेट बाइडेन के लिए अग्निपरीक्षा के समान होने वाली है। बाइडेन पूरे 90 मिनट तक पूरी दुनिया के सामने लाइव होंगे। यहां उनके बयानों से लेकर उनकी बॉडी लैंग्वेज पर पूरी दुनिया की नजरें होंगी। बाइडेन के साथ एक प्लस फैक्टर ये है कि वे पिछले चुनाव की डिबेट में ट्रम्प पर भारी पड़े थे। बाइडेन इस बार भी अपना पिछला प्रदर्शन दोहराकर अपने आलोचकों का मुंह बंद करना चाहेंगे। अगर इन 90 मिनट में बाइडेन खुद को प्रूव कर पाते हैं तो उनकी उम्र को लेकर हो रही सारी आलोचनाएं गलत साबित हो जाएंगी, मगर वे यहां लड़खड़ाते हैं तो उनकी काफी किरकिरी होगी और डेमोक्रेटिक पार्टी में उम्मीदवार बदलने की मांग तेज हो जाएगी।